शहर में थे इलेक्ट्रीशियन, अब कोरोना ने बना दिया मनरेगा मजदूर

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विश्वव्यापी महामारी कोरोना वायरस ने हर प्रकार से लोगों की जीवन को प्रभावित किया है. कामगारों और मेहनत मजदूरी करने वालों के सामने अपने परिवार का जीवनयापन करना मुश्किल हो रहा है. शहरों में काम करने वाले वापस अपने गाँव लौट चुके हैं. शहर में जो स्किल्ड वर्कर थे अब उन्हें फावड़ा उठाना पड़ रहा है.
देश में तालाबंदी होने के बाद गुजरात के बोताद में काम करने वाले चंपालाल भील सपरिवार अपने गाँव राजस्थान के राजसममंद लौट आए. पेशे से इलेक्ट्रीशियन भील दो साल पहले ही सपरिवार गुजरात में शिफ्ट हुए थे. लेकिन कोरोना संकटकाल में काम मिलना बंद हुआ तो उन्हें केल्तारा गाँव लौटना पड़ा.
अब भील मनरेगा के तहत मजदूरी कर रहे हैं. उनके साथ उनकी गर्भवती पत्नी भी मनरेगा मजदूर बन गयी हैं. ज्यादातर स्किल्ड वर्कर यही करने पर मजबूर हैं.
राज्य के मंरेगा कमिश्नर पी सी किशन ने बताया कि राज्य में वापस आने वाले प्रवासी श्रमिकों में से 60 से 70 प्रतिशत स्किल्ड हैं. उनके पास कोई और विकल्प न होने के चलते अधिकांश ने मनरेगा की ओर रुख किया है. उनके मुताबिक यह 52 लाख से अधिक मजदूरों को रोजाना रोजगार दे रहा है. यह देश में सबसे ज्यादा है.
उन्होंने बताया कि 17 अप्रैल को मनरेगा के तहत 62 हजार लोग राज्य में काम कर रहे थे. अब रोजाना बढ़ रहे हैं. राजस्थान में मनरेगा मजदूरों को रोजाना 220 रूपये प्रतिदिन की दर से दो हफ्ते में एक बार भुगतान किया जाता है.
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