सही-सलामत मजदूरों को घर पहुंचाना सरकार की ज़िम्मेदारी : मोदी बनाम अखिलेश

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इस समय सम्पूर्ण विश्व कोरेना संक्रमण के कारण लॉक डाउन के तहत खुद को संक्रमित होने से बचाने में जुटा है। भारत में भी यही स्थिति है। देश के प्रधानमंत्री ने लगभग दो महीने पहले पहले लॉक डाउन की घोषणा की। इसके बाद उसे चरणबद्ध तरीके से दो बार बढ़ा दिया गया।
अभी एक बार और बढ़ाने की आशंका व्यक्त की जा जा रही है । इस लॉक डाउन को लागू करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी ही लुभावनी और प्रेरक बातें कही। संकट की इस घड़ी में सभी ने अपने प्रधानमंत्री पर विश्वास किया और उनके दिये हुए निर्देश के अनुसार खुद के लिए एक लक्ष्मण रेखा खीच ली और उसका पालन करने लगा।
लेकिन पूर्ण बंदी होने के कारण राष्ट्र की सभी गतिविधियां बंद हो गई। सारे काम धंधे बंद हो गए । सभी लोग खाली हो गए। इसका सबसे अधिक असर उन पर पड़ा, जो अपने घरों से दूर मजदूरी करने के लिए दूसरे शहरों में रह रहे थे। मेहनत से कमा-खा रहे थे। काम बंद होने के बाद उनके पास जो राशन – पानी बचा था, वह जब तक चला, तब तक तो वे चुप बैठे रहे।
प्रथम और द्वितीय चरण के दौरान सरकार की मशीनरी ने बड़े ही चुस्त तरीके से काम किया। किसी को भूखे नहीं सोने दिया। उसमें समाज सेवकों ने भी भरपूर सहयोग किया । लेकिन बिना काम धंधे के प्रवासी मजदूरों को अपने घर की भी याद आने लगी ।
उनके पास कोई काम-धंधा न होने की वजह से वे दिन भर खाली बैठे रहते, और अपने घरवालों के साथ-साथ अपने नाते-रिशतेदारों और मित्रों से दिन भर बात करते रहते। इधर टीवी में जब समाचार सुनते कि सरकार और जनता की तमाम कोशिशों के बावजूद कोरेना का संक्रमण रोज बढ़ता जा रहा है।
संक्रमित लोगों की संख्या में कमी नहीं आ रही है, तो उसका दिल बैठने लगा। ऊपर से उनके घर – गाँव वालों का भी लगातार घर आने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा था। जो थोड़े बहुत पैसे उनके पास बचे हुए थे, वह भी धीरे-धीरे खर्च होते जा रहे थे। इस वजह से भी वह घबराया हुआ था।
उसे ऐसा भी नहीं लग रहा था कि जल्द ही काम-धंधा शुरू होगा। इसलिए उसने घर जाने के लिए अपने कदम उठा लिए। हालांकि बाद में सरकार ने विशेष ट्रेनें चलाई, लेकिन प्रवासी मजदूरों की अधिक संख्या होने की वजह से सभी को एक साथ तो नहीं लाया जा सकता था।
ऐसे में जिन प्रवासी मजदूरों का धैर्य जवाब दे गया, उन्होने अपना बोरिया बिस्तर समेटा और पैदा ही अपने घरों के लिए रवाना हो लिए । कई मजदूर सही सलामत अपने गाँव पहुँच गए। लेकिन कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो रास्ते में ही दम तोड़ दिये । अपने पक्ष में मैं यहाँ कुछ दुर्घटनाओं का भी जिक्र कर रहा हूँ, जिसने एक बार फिर समस्त राष्ट्र को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है ।
मध्य प्रदेश के गुना में भीषण सड़क हादसा हुआ। एक ट्रक और बस की जोरदार टक्कर में 8 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई है और लगभग 54 लोग घायल हो गए। ये सभी मजदूर महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश अपने घर जा रहे थे। ऐसी ही एक दुखद घटना में मुजफ्फरनगर-सहारनपुर राजमार्ग पर पैदल जा रहे छह प्रवासी कामगारों की देर रात एक तेज रफ्तार बस की चपेट में आने से मौत हो गई।
इस हादसे में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि चार ने कुछ देर बाद दम तोड़ दिया। ट्रक में सवार होकर जा रही एक महिला और बच्चे की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई और 60 लोग घायल हुए हैं। इसके पहले मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर, बड़वानी, सागर और शाजापुर जिलों में 11 प्रवासी मजदूरों की मौत हो चुकी थी।
जबकि उसमें 14 अन्य लोग घायल हो गए थे। ये सभी महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना से उत्तर प्रदेश आ रहे थे । इसी प्रकार की एक और घटना महाराष्ट्र में हुई, जिसमें एक दर्जन मजदूर पटरी पर कट कर मर गए ।
इन दुर्घटनों ने विपक्षी दलों के नेताओं को विदीर्ण कर दिया ।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने ट्वीट में लिखा कि उप्र के मुजफ्फरनगर बस हादसे में प्रवासी मज़दूरों की दर्दनाक मौत पर गहरा गहरा दुख और श्रद्धांजलि । पहले ट्रेन और अब बस हादसा, मज़दूरों की ज़िंदगी इतनी सस्ती क्यों. ‘वंदे भारत मिशन’ में क्या देश की गरीब जनता नहीं आ सकती. इतना ऊपर भी उड़ना ठीक नहीं कि ज़मीन कीसच्चाई की उपेक्षा हो जाए ।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने व्यंग में ही सही सरकार को यह भी सुझाव दिया कि क्यों न प्रवासी मजदूरों को हवाई जहाजों से उनके घर न पहुंचाया जाए ।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने एक ट्वीट में मजदूरों के राष्ट्र निर्माण में योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा कि ये सच है कि बुनियाद कभी दिखती नहीं पर ये नहीं कि उसे देखना भी नहीं चाहिए. जिन ग़रीबों के भरोसे की नींव पर आज सत्ता का इतना बड़ा महल खड़ा हुआ है, ऊँचाईयों पर पहुँचने के बाद, संकट के समय में भी उन ग़रीबों की अनदेखी करना अमानवीय है ये “सबका विश्वास” के नारे के साथ विश्वासघात है ।
साथ ही उन्होने गरीबों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के आधार पर भाजपा से यह सवाल भी किया कि क्या यही है सबका साथ और सबका विश्वास ।
अपने एक ट्वीट में अखिलेश ने लिखा कि देश के मजदूर, गरीब अपनी विपदाओं के लिए प्रबंध की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चौथे राष्ट्र सम्बोधन में उनके संबंध में एक भी शब्द नहीं कहा ? उन्होने इसे असंवेदशीलता करार दिया ।
और कहा कि इस पर देश के प्रधानमंत्री सहित प्रत्येक नागरिक को चिंतन करना चाहिए । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मजदूरों की स्थिति और सरकार द्वारा उनके लिए उठाए जा रहे कदमों पर अपनी नजर गड़ाए हुए थे। इसीलिए जैसे ही उन्हे कहीं अव्यवस्था दिखाई पड़ती, वे उसके खिलाफ अपनी आवाज जरूर उठाते । अपने एक ट्वीट में उन्होने कहा कि बुजुर्ग और अशक्त मजदूरों या उनके परिवारिजनों को स्टेशन तक पहुँचाने के लिए क्या सरकार ने ह्वील चेयर की व्यवस्था की है ।
उनका समान ले जाने और ट्रेन से उतारने के लिए क्या कुली की व्यवस्था की गई है ? ऐसे में जब पूरा देश लॉक डाउन की स्थिति से गुजर रहा है, ट्रेने नहीं चल रही हैं । इस कारण कुली भी नहीं आ रहे है, तो क्या विशेष श्रमिक ट्रेने चलाने के साथ सरकार ने कुलियों को भी अपने काम पर आने को कहा है क्या ? प्रवासी मजदूरों से ट्रेनों का किराया लिए जाने के विरोध मे भी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आवाज उठाई ।
उन्होने अपने ट्वीट में कहा कि लोगों से घरों का किराया न लेने की अपील करने वाले देश के प्रधानमंत्री रेलवे से प्रवासी मजदूरों का किराया न वसूल करने की अपील क्यों नहीं कर रहे हैं ? इसके साथ ही साथ मजदूरों से जुड़ी हुई उस समस्या का भी उन्होने मामला उठाया, जो मजदूरों के लिए सबसे अधिक कष्टकारी बन गई थी। टिकट की बुकिंग ऑन लाइन हो रही थी। जो फार्म भी था, वह भी इंगलिश मे है।
जबकि सभी जानते हैं कि देश के कुछ युवा मजदूरों को अगर छोड़ दें, तो किसी भी मजदूर के पास स्मार्ट फोन तो होगा ही नहीं । इस समस्या का समाधान करने के लिए अखिलेश यादव ने अपील की । इसी तरह अपने गाँव के लिए रवाना एक गर्भवती महिला द्वारा सड़क पर प्रसव होने को लेकर भी उन्होने सरकार को घेरा ।
अपने ट्वीट में उन्होने कहा कि उस महिला के लिए आगे का सफर कितना मुश्किल होगा, इसकी तो कल्पना की ही जा सकती थी। उस महिला के लिए कम से कम सरकार और प्रशासन को कोई न कोई व्यवस्था करना चाहिए था ।
इसी तरह मजदूरों की भूख का जिक्र करते हुए उन्होने अपने एक ट्वीट में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक सभी को घर देने का वायदा किया था, और आज हालत यह है कि अपने द्वारा घोषित लॉक डाउन के दौरान वे मजदूरों को रोटी भी नहीं दे पा रहे हैं । अपने एक ट्वीट में उन्होने फिर व्यवस्था पर सवाल खड़े किए ।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिस देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हों । लाखों लोग रोजी रोटी की तलाश में दूसरे प्रदेशों में हों, उन्हे उनके घर पहुंचाने और लंबे समय तक उनके लिए रोटी की व्यवस्था का प्रबंध करना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन जरूर है ।
लेकिन यह भी सवाल देश के हर नागरिक के मन में है कि क्या इस देश का मजदूर ही भूख या दुर्घटना से मरने के लिए ही पैदा हुआ है ? क्या राष्ट्र निर्माण या देश को आत्म निर्भर बनाने में, जिसकी चर्चा इस समय ज़ोर शोर से चल रही है, उसका कोई योगदान नहीं है, या नही होने वाला है ।
यह सभी जानते हैं कि बिना श्रमिक शक्ति के न तो हम स्वदेशी की कल्पना को साकार कर सकते हैं और न ही आत्म निर्भर बन सकते हैं । इसलिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे वह सही सलामत अपने गाँव अपनों के बीच पहुँच जाए ।
प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव
पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट
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