गुर्जर स्वाभिमान संघ 23 मई को मना रहा है काला दिवस, लखन गुर्जर रांकौली ने इन्हें दी श्रद्धांजलि

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आरक्षण की मांग को लेकर साल 2006 से 2008 तक राजस्थान में चले गुर्जर आंदोलन की यादें आज भी गुर्जर समाज के दिलों में ताजा हैं. 23 मई को गुर्जर समाज काला दिवस के रूप में मनाता आ रहा है. इस दिन पुलिस फायरिंग में 72 लोगों ने अपनी जान गवां दी थी.
गुर्जर स्वाभिमान संघ के प्रदेश अध्यक्ष लखन गुर्जर रांकौली ने बताया कि राजस्थान में गुर्जरों का आंदोलन समाप्त हो चुका है. आंदोलन के बाद सरकार ने कानून बनाकर उन्हें विशेष पिछड़ा वर्ग के तौर पर 5 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया है. इसके लिए राज्य विधानसभा में बिल पास करके केंद्र के पास भेजा जाएगा और इसे नौवीं अनुसूची में डाला जाएगा. इसके बाद ये अदालतों की समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा. केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों की बातचीत के बाद ये फ़ैसला हुआ.

लखन गुर्जर रांकौली ने बताया कि देश भर में उत्तर-पश्चिमी भारत के कई राज्यों में गुर्जर समुदाय के क़रीब साढ़े पांच करोड़ लोग हैं. इनमें 11 फ़ीसदी, यानी क़रीब 6 लाख लोग राजस्थान में हैं. जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में इन्हें अनुसूचित जनजाति, यानी आदिवासियों का दर्जा हासिल है, जबकि राजस्थान में वो ओबीसी में आते हैं और इस तौर पर उन्हें आरक्षण के फ़ायदे मिलते हैं.
लेकिन गुर्जर समुदाय को लगता रहा है कि उन तक पिछड़ा वर्ग के लाभ पहुंच नहीं पा रहा है. उनकी मांग है कि उन्हें आदिवासियों में शामिल किया जाए. हालांकि इस मांग के खि़लाफ़ राज्य का मीणा समुदाय भी आंदोलन कर चुका है जिसे लगता है कि अगर गुर्जरों को आदिवासी मान लिया गया तो उनके हक़ छिन जाएंगे.

अब गुर्जर नेताओं का कहना है, अब आदिवासी दर्जा भले न मिले, उन्हें पचास फ़ीसदी की तय सीमा के भीतर ही पांच फ़ीसदी आरक्षण चाहिए. उनकी शिकायत ये भी है कि सरकार जाटों पर तो मेहरबान है मगर गुर्जर समाज को ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
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